शांति विधेयक: भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र का निजीकरण

 

शांति विधेयक, 2025: भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के लिए एक व्यापक नीति विश्लेषण

1.0 परिचय: भारत के परमाणु भविष्य को पुनर्भाषित करना

भारत के नागरिक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में एक निर्णायक मोड़ के रूप में, केंद्र सरकार ने सतत हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) विधेयक, 2025 प्रस्तुत किया है। यह ऐतिहासिक विधायी सुधार भारत के परमाणु शासन की आधारशिला रहे दो प्रमुख कानूनों—परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962, और परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010—को निरस्त करने का प्रस्ताव करता है। इसका रणनीतिक महत्व भारत के कसकर विनियमित परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को पहली बार निजी भागीदारी के लिए खोलने में निहित है। यह विश्लेषण विधेयक के प्रमुख प्रावधानों, इसके संभावित प्रभावों और इसके परिचय के आसपास की व्यापक बहस का गंभीर रूप से परीक्षण करेगा, जिसमें इस नीतिगत दांव के অন্তর্निहित जोखिमों और पुरस्कारों का मूल्यांकन किया जाएगा।

यह नीति पत्र सर्वप्रथम उस विधायी पृष्ठभूमि का विश्लेषण करेगा जिसे शांति विधेयक बदलने का प्रयास कर रहा है, जिसमें मौजूदा कानूनों की नींव और सीमाओं पर प्रकाश डाला गया है। इसके बाद, यह विधेयक के सबसे परिवर्तनकारी पहलुओं—निजी क्षेत्र की भागीदारी का समावेश, दायित्व व्यवस्था का आमूलचूल पुनर्गठन, और एक नए विनियामक ढांचे की स्थापना—की गहन जांच करेगा। अंत में, यह विधेयक के आर्थिक, सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का मूल्यांकन करेगा और हितधारकों के दृष्टिकोणों और आलोचनाओं को प्रस्तुत करेगा।

यह व्यापक दृष्टिकोण नीति निर्माताओं, उद्योग के हितधारकों और नागरिक समाज को उस मार्ग को समझने में सक्षम बनाएगा जिस पर भारत अग्रसर है। यह विधेयक केवल एक कानूनी समायोजन नहीं है, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु प्रतिबद्धताओं और वैश्विक सामरिक स्थिति के संदर्भ में देश के परमाणु सिद्धांत का एक रणनीतिक पुनर्संरचना है।

2.0 विधायी पृष्ठभूमि: मौजूदा परमाणु शासन की नींव और सीमाएँ

शांति विधेयक के महत्व को पूरी तरह से समझने के लिए, उस कानूनी ढांचे का विश्लेषण करना आवश्यक है जिसे यह बदलने का इरादा रखता है। परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962, और परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम (CLNDA), 2010 ने मिलकर एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की जिसने भारत के परमाणु क्षेत्र पर सरकार के एकाधिकार को मजबूत किया। यह ढांचा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की चिंताओं से प्रेरित था, लेकिन समय के साथ, इसे क्षेत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण बाधा के रूप में देखा जाने लगा।

परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 के मूल सिद्धांत ने परमाणु ऊर्जा से संबंधित सभी गतिविधियों को विशेष रूप से सार्वजनिक उद्यमों के लिए आरक्षित कर दिया। इसके तहत, केवल न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) जैसी सरकारी कंपनियों को ही परमाणु ऊर्जा सुविधाओं के संचालन के लिए अधिकृत किया गया था। इस सरकार-केंद्रित मॉडल ने दशकों तक भारत के परमाणु कार्यक्रम को आकार दिया, लेकिन इसने निजी क्षेत्र की पूंजी, प्रौद्योगिकी और नवाचार को भी इस महत्वपूर्ण क्षेत्र से बाहर रखा।

2010 में, भारत ने परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम (CLNDA) पारित किया, जिसका उद्देश्य परमाणु दुर्घटना की स्थिति में पीड़ितों को त्वरित मुआवजा प्रदान करना था। हालांकि, इसके दो प्रावधान अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं, विशेष रूप से अमेरिकी परमाणु कंपनियों के लिए एक बड़ी बाधा बन गए। धारा 17 ने ऑपरेटर को दोषपूर्ण उपकरणों के कारण हुई दुर्घटना की स्थिति में आपूर्तिकर्ता के खिलाफ प्रतिदावे का अधिकार (right of recourse) दिया। इसके अतिरिक्त, धारा 46 ने पीड़ितों को अन्य कानूनों के तहत दीवानी अदालतों में टोट (tort) दावे करने की अनुमति दी, जिससे आपूर्तिकर्ताओं के लिए असीमित और अप्रत्याशित देयता का जोखिम पैदा हो गया। इन प्रावधानों को अंतरराष्ट्रीय निवेशकों द्वारा एक महत्वपूर्ण निवारक माना जाता था, जिसने भारत-अमेरिका परमाणु समझौते की पूर्ण क्षमता को बाधित किया। इन कथित सीमाओं और निवेश बाधाओं ने एक नए, एकीकृत कानून की आवश्यकता पैदा की, जिसे शांति विधेयक के माध्यम से संबोधित करने का प्रयास किया गया है।

3.0 शांति विधेयक, 2025 के मुख्य प्रावधानों का विश्लेषण

शांति विधेयक, 2025 भारत के परमाणु शासन में एक मौलिक प्रतिमान बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो दशकों पुराने राज्य के एकाधिकार को समाप्त करता है। यह विधेयक तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित है जो क्षेत्र को फिर से आकार देने का वादा करते हैं: निजी क्षेत्र की भागीदारी का परिचय, नागरिक दायित्व व्यवस्था का एक क्रांतिकारी पुनर्गठन, और एक नए नियामक और न्यायनिर्णयन ढांचे का निर्माण। यह खंड इन मूलभूत प्रावधानों का विस्तृत विश्लेषण करेगा।

3.1 निजी क्षेत्र की भागीदारी का मार्ग प्रशस्त करना

स्वतंत्रता के बाद पहली बार, शांति विधेयक निजी कंपनियों और संयुक्त उद्यमों के लिए परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में प्रवेश के द्वार खोलता है। यह कदम भारत की ऊर्जा क्षमता का विस्तार करने और महत्वाकांक्षी जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निजी पूंजी और विशेषज्ञता का लाभ उठाने की सरकार की रणनीति को दर्शाता है। निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए अनुमत विशिष्ट गतिविधियों में शामिल हैं:

  • संयंत्र संचालन: परमाणु ऊर्जा संयंत्रों और रिएक्टरों का निर्माण, स्वामित्व, संचालन और डीकमीशनिंग करना।
  • इक्विटी निवेश: परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में 49% तक का निवेश करने की अनुमति।
  • ईंधन निर्माण: परमाणु ईंधन निर्माण के लिए लाइसेंस प्राप्त करना, जिसमें एक निर्दिष्ट सीमा तक यूरेनियम-235 का संवर्धन, रूपांतरण और शोधन शामिल है।
  • लॉजिस्टिक्स और व्यापार: परमाणु ईंधन, खर्च किए गए ईंधन और संबंधित उपकरणों का परिवहन, भंडारण, आयात और निर्यात करना।

हालांकि, यह उदारीकरण एक रणनीतिक संतुलन के साथ आता है। विधेयक राष्ट्रीय सुरक्षा और अप्रसार जोखिमों से जुड़े कार्यों पर सख्त सरकारी नियंत्रण बनाए रखता है। इसका रणनीतिक तर्क स्पष्ट है: वाणिज्यिक गतिविधियों (निर्माण, संचालन) को निजी पूंजी और दक्षता का लाभ उठाने के लिए खोला गया है, जबकि प्रत्यक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा निहितार्थ वाले कार्य (भारी जल उत्पादन, रेडियोधर्मी कचरा प्रबंधन, और खर्च किए गए ईंधन चक्र का प्रबंधन) परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के विशेष नियंत्रण में रहेंगे। यह विभाजन वाणिज्यिक प्रोत्साहन और राष्ट्रीय सुरक्षा अनिवार्यता के बीच एक विवेकपूर्ण सीमांकन सुनिश्चित करता है।

3.2 नागरिक दायित्व व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन

संभवतः विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन नागरिक दायित्व व्यवस्था का पुनर्गठन है, जो लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय परमाणु व्यापार में एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। सबसे बड़ा बदलाव CLNDA, 2010 से आपूर्तिकर्ता दायित्व खंड का पूर्ण उन्मूलन है। यह खंड अमेरिकी परमाणु आपूर्तिकर्ताओं के लिए एक प्रमुख बाधा था और भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु सहयोग की पूरी क्षमता को साकार करने में एक बड़ी रुकावट थी।

नीचे दी गई तालिका CLNDA, 2010 और शांति विधेयक, 2025 के दायित्व ढांचे के बीच प्रमुख अंतरों को दर्शाती है:

विशेषता

CLNDA, 2010

शांति विधेयक, 2025

आपूर्तिकर्ता दायित्व

धारा 17 और 46 के तहत मौजूद, जो आपूर्तिकर्ताओं को उत्तरदायी बनाता था।

पूरी तरह से हटा दिया गया।

ऑपरेटर का दायित्व

एक विशिष्ट राशि पर सीमित।

रिएक्टर की तापीय क्षमता से जुड़ा हुआ; ₹100 करोड़ से ₹3,000 करोड़ तक।

सरकार की भूमिका

ऑपरेटर की सीमा से अधिक दायित्व को कवर करती है।

ऑपरेटर की सीमा से अधिक दायित्व को कवर करने की भूमिका जारी है।

पीड़ित मुआवजा

"बिना दोष दायित्व" सिद्धांत और परमाणु दायित्व कोष की स्थापना।

"बिना दोष दायित्व" सिद्धांत को बनाए रखता है और परमाणु दायित्व कोष जारी रखता है।

यह नया ढांचा भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु दायित्व मानदंडों के अनुरूप लाता है, जिससे विदेशी कंपनियों के लिए निवेश करना और प्रौद्योगिकी प्रदान करना आसान हो जाता है। ऑपरेटर के दायित्व को रिएक्टर की क्षमता से जोड़ना भी छोटी मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) जैसी नई प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है।

3.3 एक नवीन नियामक और न्यायनिर्णयन ढांचा

एक मजबूत और स्वतंत्र नियामक वातावरण बनाने के लिए, शांति विधेयक कई संस्थागत सुधारों का प्रस्ताव करता है। इन सुधारों का उद्देश्य विनियामक निश्चितता बढ़ाना, विवादों को कुशलतापूर्वक हल करना और परमाणु गतिविधियों की कड़ी निगरानी सुनिश्चित करना है। प्रमुख नई या सशक्त संस्थाओं में शामिल हैं:

  1. परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB): विधेयक AERB को वैधानिक दर्जा प्रदान करता है। इसका अर्थ है कि यह निकाय अब केवल एक कार्यकारी आदेश द्वारा निर्मित नहीं है, बल्कि संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित है। यह इसे राजनीतिक प्रभाव से अधिक स्वतंत्रता, अधिकार और स्थायित्व प्रदान करता है, जिससे स्वतंत्र निरीक्षण में काफी मजबूती आती है।
  2. परमाणु ऊर्जा निवारण सलाहकार परिषद: यह परिषद परमाणु ऊर्जा से संबंधित विवादों के समाधान के लिए एक विशेष मंच के रूप में काम करेगी।
  3. परमाणु क्षति दावा आयोग: गंभीर परमाणु क्षति के मामलों के न्यायनिर्णयन के लिए एक समर्पित आयोग की स्थापना की जाएगी, जिससे पीड़ितों के लिए दावों की प्रक्रिया को सुव्यवस्थित किया जा सके।

इसके अतिरिक्त, विधेयक की धारा 81 परमाणु मामलों में दीवानी अदालतों के अधिकार क्षेत्र को प्रतिबंधित करती है। यह प्रावधान CLNDA की धारा 46 द्वारा उत्पन्न समस्या का सीधा विधायी समाधान है, जिसने आपूर्तिकर्ताओं के लिए अनिश्चित टोट दावों का द्वार खोल दिया था। दीवानी अदालतों को प्रतिबंधित करके, सरकार उस कानूनी अनिश्चितता को समाप्त कर रही है। हालांकि, निर्दिष्ट अपीलीय न्यायाधिकरण के आदेशों के खिलाफ अपील अभी भी सर्वोच्च न्यायालय में दायर की जा सकती है, जो न्यायिक समीक्षा का एक मार्ग सुनिश्चित करता है।

4.0 संभावित प्रभावों का आकलन

किसी भी नीति का वास्तविक मूल्य उसके विधायी पाठ में नहीं, बल्कि उसके वास्तविक दुनिया के प्रभावों में निहित होता है। शांति विधेयक भारत की परमाणु नीति में एक गणनात्मक दांव का प्रतिनिधित्व करता है, जो ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी उन्नति और जलवायु कार्रवाई में परिवर्तनकारी लाभों के लिए सार्वजनिक जोखिम की एक डिग्री का व्यापार करता है। यह खंड विधेयक के संभावित आर्थिक, सुरक्षा और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों का आकलन करेगा।

4.1 आर्थिक और औद्योगिक प्रभाव

यह विधेयक भारत के महत्वाकांक्षी ऊर्जा लक्ष्यों को प्राप्त करने की क्षमता रखता है। सरकार ने 2047 तक 100 गीगावाट (GW) परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने और 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश और प्रौद्योगिकी की आवश्यकता है, जिसे केवल सरकारी प्रयासों से पूरा नहीं किया जा सकता है।

निवेश की बाधाओं को दूर करके और दायित्व व्यवस्था को स्पष्ट करके, शांति विधेयक घरेलू और विदेशी दोनों तरह की पूंजी को आकर्षित करने के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाता है। यह विधेयक विशेष रूप से छोटी मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है। SMRs औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन और विश्वसनीय बेसलोड पावर प्रदान करने के लिए एक लचीला और स्केलेबल समाधान प्रदान करते हैं, जो भारत के दीर्घकालिक औद्योगिक विकास का समर्थन कर सकता है।

4.2 सुरक्षा और संरक्षा निहितार्थ

परमाणु ऊर्जा जैसे "अत्यधिक खतरनाक" उद्योग में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ कड़े राज्य नियंत्रण को बनाए रखना एक नाजुक संतुलन है। रेडियोधर्मी कचरा प्रबंधन और भारी जल उत्पादन जैसे सबसे संवेदनशील कार्यों को सरकार के विशेष नियंत्रण में रखकर, विधेयक सुरक्षा जोखिमों को कम करता है। हालांकि, यह एक महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक प्रश्न खड़ा करता है: क्या एक नव सशक्त वैधानिक AERB लाभ-संचालित निजी ऑपरेटरों को विनियमित करने के लिए राजनीतिक और कॉर्पोरेट दबाव से पर्याप्त रूप से अछूता है? एक एकल सरकारी स्वामित्व वाली इकाई (NPCIL) की तुलना में निजी और सार्वजनिक खिलाड़ियों के एक विविध पारिस्थितिकी तंत्र को विनियमित करने से उत्पन्न होने वाली नई चुनौतियाँ नियामक की स्वतंत्रता और क्षमता की कड़ी परीक्षा लेंगी। सुरक्षा प्रोटोकॉल की कीमत पर क्षमता विस्तार को रोकने के लिए अटूट नियामक सतर्कता सर्वोपरि होगी।

4.3 अंतर्राष्ट्रीय संबंध और व्यापार

शांति विधेयक के भू-राजनीतिक निहितार्थ भी महत्वपूर्ण हैं, खासकर भारत-अमेरिका परमाणु संबंधों के संदर्भ में। आपूर्तिकर्ता दायित्व खंड को हटाना संयुक्त राज्य अमेरिका की एक दशक पुरानी मांग को पूरा करता है, जो भारत-अमेरिका नागरिक परमाणु समझौते के पूर्ण कार्यान्वयन में एक बड़ी बाधा थी। यह विधेयक केवल एक नई घरेलू नीति पहल नहीं है, बल्कि एक लंबी कूटनीतिक और वाणिज्यिक वार्ता का समापन है। जनवरी 2015 में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत यात्रा के दौरान एक "निर्णायक समझ" (breakthrough understanding) की घोषणा की थी, जब भारत सरकार ने अमेरिकी चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया था। शांति विधेयक उस समझ को विधायी वास्तविकता में बदल देता है, जिससे अमेरिकी निगमों से अरबों डॉलर के रिएक्टरों की बिक्री का मार्ग प्रशस्त हो सकता है और रणनीतिक साझेदारी को और मजबूती मिल सकती है।

5.0 हितधारक दृष्टिकोण और समालोचना

नीति विश्लेषण में विभिन्न दृष्टिकोणों पर विचार करना महत्वपूर्ण है। शांति विधेयक ने सरकार, विपक्ष और नीति विश्लेषकों के बीच एक जीवंत बहस छेड़ दी है। यह खंड विधेयक के पक्ष और विपक्ष दोनों में दिए गए प्रमुख तर्कों को प्रस्तुत करता है, जिससे इसके बहुआयामी प्रभावों की एक संतुलित समझ मिलती है।

5.1 सरकार का तर्क और घोषित उद्देश्य

विधेयक के "उद्देश्यों और कारणों के कथन" में, सरकार ने इस व्यापक सुधार की आवश्यकता के लिए कई तर्क प्रस्तुत किए हैं। ये तर्क भारत के ऊर्जा भविष्य और वैश्विक मंच पर इसकी भूमिका के बारे में सरकार के दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। मुख्य औचित्य निम्नलिखित हैं:

  • भारत के कुल ऊर्जा मिश्रण में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाना।
  • परमाणु विज्ञान में नवाचार को सुगम बनाना और इसके गैर-बिजली अनुप्रयोगों का विस्तार करना।
  • भारत के परमाणु संसाधनों की पूरी क्षमता का उपयोग करने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी का लाभ उठाना।
  • कई मौजूदा कानूनों को एक एकल, एकीकृत कानूनी व्यवस्था में सुव्यवस्थित करना।

सरकार का तर्क है कि ये सुधार भारत को 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने और 2070 तक शुद्ध-शून्य अर्थव्यवस्था बनने में सक्षम बनाएंगे।

5.2 विपक्ष और विश्लेषकों की आलोचना

विधेयक को विपक्ष और कुछ नीति विश्लेषकों की ओर से महत्वपूर्ण आलोचना का सामना करना पड़ा है। आलोचकों ने मुख्य रूप से दायित्व को सीमित करने और एक खतरनाक उद्योग में निजी लाभ-प्रेरित कंपनियों को अनुमति देने के संभावित जोखिमों पर ध्यान केंद्रित किया है।

कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इस चिंता को व्यक्त करते हुए तर्क दिया कि "अत्यधिक खतरनाक परमाणु गतिविधियों में लाभ चाहने वाली निजी भागीदारी को अनुमति देना और साथ ही साथ दायित्व को सीमित करना जीवन, स्वास्थ्य और पर्यावरण पर राज्य के सार्वजनिक विश्वास के दायित्वों (public trust obligations) को कमजोर करता है।" "सार्वजनिक विश्वास का सिद्धांत" यह मानता है कि राज्य कुछ महत्वपूर्ण संसाधनों और जिम्मेदारियों (जैसे नागरिकों को खतरनाक गतिविधियों से बचाना) को जनता के लिए एक ट्रस्ट में रखता है और उन्हें अंतिम जवाबदेही बनाए बिना केवल लाभ कमाने वाली संस्थाओं को नहीं सौंप सकता।

एक और प्रमुख आलोचना यह है कि आपूर्तिकर्ता दायित्व को हटाकर, विधेयक "दोषपूर्ण उपकरणों के कारण होने वाली दुर्घटनाओं के लिए एक फ्री पास" प्रदान करता है। आलोचकों का तर्क है कि यह अंतरराष्ट्रीय निगमों से जोखिम को दूर करता है और इसे भारतीय ऑपरेटरों और अंततः भारतीय जनता पर डाल देता है।

6.0 निष्कर्ष: भारत के परमाणु पथ के लिए अवसर और चुनौतियाँ

सतत हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) विधेयक, 2025, भारत के परमाणु शासन में एक मौलिक प्रतिमान बदलाव का प्रतीक है। यह देश को एक राज्य-एकाधिकार मॉडल से दूर एक विनियमित सार्वजनिक-निजी ढांचे की ओर ले जाता है, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास को गति देने के लिए बनाया गया है। यह विश्लेषण दर्शाता है कि विधेयक एक महत्वाकांक्षी सुधार है जो महत्वपूर्ण अवसरों के साथ-साथ गंभीर चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करता है।

एक ओर, यह विधेयक भारत के लिए अपार संभावनाएं खोलता है। निजी क्षेत्र की भागीदारी और एक स्पष्ट दायित्व व्यवस्था की शुरुआत करके, यह घरेलू और विदेशी निवेश को आकर्षित कर सकता है, जिससे भारत को 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद मिल सकती है। यह छोटी मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों तक पहुंच को भी सुगम बना सकता है, जो भारत के शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्यों में योगदान कर सकते हैं। दूसरी ओर, चुनौतियाँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। सबसे बड़ी चुनौती एक विस्तारित और विविध परमाणु क्षेत्र में अटूट सुरक्षा और संरक्षा मानकों को सुनिश्चित करना है, साथ ही सार्वजनिक विश्वास की चिंताओं को संबोधित करना है। वाणिज्यिक हितों को राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ संतुलित करने के लिए एक असाधारण रूप से मजबूत और स्वतंत्र नियामक की आवश्यकता होगी।

अंततः, शांति विधेयक भारत के लिए एक साहसिक कदम है, जो सार्वजनिक जोखिम की एक डिग्री को ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी उन्नति और जलवायु कार्रवाई में परिवर्तनकारी लाभों के लिए एक गणनात्मक व्यापार के रूप में देखता है। इस विधेयक का क्रियान्वयन आने वाले दशकों में न केवल भारत की ऊर्जा सुरक्षा को आकार देगा, बल्कि वैश्विक मंच पर इसकी रणनीतिक स्थिति को भी परिभाषित करेगा।

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